सिनेमा, जो समाज का दर्पण कहलता है। सिनेमा, समाज को बदलने का दमखम रखता है। सिनेमा और उसमें काम करने वाले अभिनेता व अभिनेत्रियों से प्रभावित होकर युवा उन्हीं के जैसा बनने का प्रयास करते हैं। ऐसे में नए दौर के अभिनेता और अभिनेत्रियां इस समाज को क्या दे रहे हैं, इसी विषय पर चूंकि लेख थोड़ा बड़ा है इसलिए इसे दो भागों मंे प्रस्तुत किया जा रहा है। पहला भाग भारतीय फिल्मों का स्वर्णिम युग और दूसरा फिल्म जगत का स्याह पक्ष -
भारत की पहली फिल्म (मूक) राजा हरिश्चंद्र के दृश्य
विश्व सिनेमा का इतिहास पिछले सवा सौ वर्षों का है। 1895 में विश्व कि पहली फिल्म ‘अरायव्हल ऑफ द ट्रेन’ बनी। जबकि भारत में सिनेमा की शुरूआत भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले 'धुंडीराज गोविंद फाल्के' जिन्हें दुनियां 'दादा साहब फाल्के' के नाम से जानती है, ने की थी। उनको सम्मान देते हुए भारत सरकार द्वारा 1970 से फिल्म जगत का सबसे बड़ा पुरस्कार 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' दिया जाता है। उन्होंने लंदन में फिल्म बनाने की जानकारी प्राप्त की और फिल्म बनाने में उपयोग किए जाने वाले उपकरण लेकर वर्ष 1912 में भारत लौटे। अब भारतीय सिनेमा की पहली मूक फिल्म का निर्माण होने जा रहा था। जो सच के पर्याय माने जाने वाले 'राजा हरश्चिंद्र' के जीवन पर आधारित थी। फिल्म तैयार होने के बाद '12 अप्रैल 913 में राजा हरिश्चंद्र' फिल्म का प्रदर्शन तत्कालीन बंबई के एक थियेटर में किया गया। नाटकों की अभ्यस्त जनता को फिल्म काफी पसंद आई। यहां यह बात गौर करने लायक है कि उस समय दादा साहब फाल्के को फिल्म में रजा हरिश्चंद्र की पत्नी की भूमिका निभाने के लिए कोई महिला पात्र नहीं मिली यहां तक कि उन्होंने वैश्याओं से भी मनुहार लगाई लेकिन उन्होंने भी फिल्म में यह कहकर काम करने से इंकार कर दिया कि फिल्म में काम करने से अच्छा है कि वह देह व्यापार ही करती रहें। मजबूरी में राजा हरिश्चंद्र की पत्नी के भूमिका के लिए उन्हें एक पुरूष पात्र ही रखना पड़ा। इस पहली मूक फिल्म के बाद 18 वर्षों तक विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक पात्रों पर मूक फिल्मों का निर्माण होता रहा। लेकिन मूक फिल्मों से अब दर्शक ऊबने लगे थे। 18 वर्षों बाद आर्देशिर ईरानी ने 14 मार्च 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा बनाई। जिसमें संवादों के साथ गीत संगीत भी था। उस समय पर्दे पर चलते फिरते जीवंत दृश्य दर्शकों के लिए आश्चर्य का विषय था। धीरे धीरे सिनेमा का विकास होता रहा। अब श्वेत श्याम फिल्मों ने एक कदम आगे बढ़कर रंगीन दुनियां में कदम रखा। वर्ष 1937 में प्रथम रंगीन फिल्म किसान कन्या रिलीज हुई और इसके बाद फिल्मी दुनियां के रूपहले पर्दे के आकर्षण से लोग बच नहीं सके।
भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा का पोस्टर
फिल्में समाज को बदलने का एक सशक्त माध्यम थीं। आजादी के पूर्व भारत में राज कर रहे अंग्रेज इस बात को जानते थे। इसलिए उन्होंने ऐसी किसी फिल्म का निर्माण नहीं होने दिया जो भारतीय जनमानस में अंग्रेज के प्रति नफरत फैला सके। इसलिए उस दौर की अधिकांश फिल्में धार्मिक और ऐतिहासिक पात्रों पर ही आधारित रहीं। आजादी के बाद के वर्षो में भारत में स्वतंत्रता संग्राम, देश विभाजन जैसी ऐतिहासिक घटना हुई। उन दौरान बनी हिंदी फिल्मों में इसका प्रभाव छाया रहा। अंग्रेजों के प्रति जनता की नफरत का भारतीय फिल्मकारों ने अच्छा उपयोग किया और देशप्रेम की भावनाओं से ओतप्रोत फिल्मों का प्रदर्शन कर अच्छी कमाई भी की। उस समय फिल्में समाज से काफी प्रेरित होती थीं।
1950 से 1960 का दशक भारतीय सिनेमा के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है। क्योंकि गुरुदत्त, राज कपूर, दिलीप कुमार, मीना कुमारी, मधुबाला, नर्गिस, नूतन, देव आनंद और वाहीदा रहमान जैसे कुछ यादगार कलाकारों का जब उदय हुआ। इस दौर की फिल्मों में प्रेम कहानियों के साथ ही अमीर और गरीब को स्थान दिया गया। 1960 से 1970 के दशकों में फिल्मों में हिंसा का प्रभाव रहा। इस दौरान की फिल्मों में जमींदारी प्रथा, शोषण, अन्याय, खेत खलिहान, ब्याजखोरी, बंधुआ मजदूरी के मुद्दे छाए रहे। 1970 से 1980 के दशक में प्रेम आधारित फिल्में वापस लोकप्रिय होने लगी। राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, संजीव कुमार, हेमा मालिनी आदि अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने अपनी आभा से दर्शकों को मंत्र मुग्ध किया। 1980 से 1990 के दशक में अमिताभ बच्चन ने एंग्री यंगमैन के रूप में फिल्मों में आम जनता के आक्रोश को बखूबी पर्दे पर उड़ेला। सामंतवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, दहेज प्रथा आदि समस्याओं ने जन्म ले लिया था। इससे त्रस्त आम जनजीवन की समस्याओं को लेकर उन्होंने ऐसे किरदार निभाए कि लोग अपनी समस्याओं का हल उनमें ढूंढने लगे।
भारत की पहली रंगीन फिल्म किसान कन्या का पोस्टर
1990 से 2000 के दशक में बनी फिल्में भारत के बाहर भी काफी लोकप्रिय रही। प्रवासी भारतीयो की बढती संख्या भी इसका प्रमुख कारण थी। लेकिन अब सिनेमा में पश्चिमी प्रभाव आना शुरू हो गया था। फिल्मों की कमाई भी बढ़नी शुरू हो गई। साथ ही फिल्मों की बढ़ती कमाई को देखकर अंडरवल्र्ड के लोग भी आकर्षित हुए। अब फिल्में सामाजिक संदेश के लिए नहीं बल्कि कमाई के लिए बनने लगी। कहते हैं कि 'पैसा अपने साथ बुराई भी लेकर आता है।' यही कुछ भारतीय फिल्म उद्योग के साथ भी हुआ। 2000 से 2020 तक के सफर में यह हमें बखूबी दिखता है। इस दौरान जहां फिल्मों की तकनीक विश्वस्तरीय हुई है। अब तकनीक के माध्यम से धरती, आकाश व पानी के अलावा अंतरिक्ष और फंतासी के अलावा भूत प्रेत व कल्पनाओं की जहां तक उड़ान हो सकती है वह सभी दृश्य तकनीक के माध्यम से फिल्मी पर्दे पर जीवंत किए जा सकते हैं।
यहां बताना जरूरी है कि भारतीय में कई भारतीय भाषों की फिल्मों बनती है। तकनीक के रूप में देखा जाए तो दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग बाॅलीबुड मसाला फिल्मों से काफी आगे है। लेकिन जहां बाॅलीवुड मसाला फिल्मों में नग्नता, फूहड़ता अपने चरम पर है वहीं दक्षिण भारतीय फिल्मों जो आज केवल टीवी पर सहज उपलब्ध हैं, आपने देखा होगा कि इन फिल्मों में अभी भी स्त्री को स्त्री रूप में ही प्रदर्शित किया जाता है। भोग या विलासता की वस्तु के रूप में नहीं परोसा जाता है। इसके अलावा फिल्मों दर्शकों को सकारात्मक संदेश भी देती हैं। जहां बाॅलीबुड मसाला फिल्म में धर्म को हास्य का विषय और धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को दबा, कुचला और कुंठित दिखाया जाता है। वहीं, दक्षिण भारतीय फिल्म में धर्म को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। जबकि यहां मोबाइल के लिए हाल ही में विकसित हुए नेटफिलिक्स, अमेजन प्राइम, जी 5, हाॅटस्टार, आल्ट बालाजी आदि पर प्रदर्शित होने वाली बेव सीरीज की बात करना ही बेमानी है। क्योंकि यहां मुख्य विषय ही हिंसा, अश्लीलता, गाली, गलौज, लिव इन रिलेशनशिप आदि ही हैं।
अभी तक हमने भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग और फिल्में के माध्यम से समाज में व्यापक प्रभाव पर चर्चा की है। अगले अंक मंे चर्चा करेंगे कि फिल्म जगत के अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के बारे में, जो समाज के युवा वर्ग को काफी प्रभावित करते हैं। युवा उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। क्या वह अपनी जिम्मेदारी को ठीक से निभा रहे हैं। यदि नहीं, तो फिर उनके साथ क्या किया जाए। हमारे समाज में मनोरंजन के लिए खेल भी एक प्रमुख भूमिका निभाता है। यद्यपि भारतीय सिनेमा का प्रमुख शब्द मनोरंजन है, इसलिए समाज के प्रति खेल से अधिक फिल्म उद्योग की जिम्मेदारी है, क्योंकि फिल्में दर्शकों के मन को प्रभावित करती है।