पहले ये जान लेते है की आखिर नेहरू ने किस स्तर पर गलतियाँ की थी ,
यह दौर वह था, जब अमेरिका ने चीन से अपने संबंध तोड़ रखे थे, उस दौर में अमेरिका से चीन की बात नई दिल्ली के माध्यम से होती थी। तब नेहरू गांधी के समर्थन के कारण अहिंसा का सहारा ले रहे रहे थे। चीन ने वर्ष 1955 के आसपास ही एक नक्शा जारी कर अक्साई चीन को अपना हिस्सा बता दिया था। इसके बाद भी नेहरू, चीन से मित्रता की बात कर रहे थे। वह कई सारे सेक्युलर मित्रों के साथ चीन की यात्रा के दौरान बौद्ध दर्शन से प्रभावित होकर पंचशील सिद्धांत के साथ हिंदी, चीनी भाई-भाई के नारे लगा रहे थे।
वह तिब्बत पर हमला कर उस पर कब्जा कर चुका था
दरअसल नेहरु को पता था कि चीन उसके साथ दगा करेगा, लेकिन नेहरु ने चीन को खुश करने के लिए सेक्युलर मित्रों का साथ लिया। उसका एक कारण यह भी है कि नेहरु स्वयं अपनी जवानी में ‘सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ’ (यानी USSR -Union of Soviet Socialist Republics) में गए थे। वहां से लौटकर वह अक्सर ‘सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ’ की तारीफ करते नहीं अघाते थे।
(यहां बता देना समीचीन होगा कि सोवियत संघ को समाजवादी गणतंत्र संघ कहकर पुकारा जाता था। यह 15 गणराज्यों को मिलाकर स्थापित किया गया एक देश था, जो 1922 से 1991 तक पूर्वी यूरोप, पूर्वी एशिया और मध्य एशिया के उत्तरी इलाके में बसा हुआ था। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह दुनिया का सबसे बड़ा देश था। यह देश पूरी दुनिया के 7वें हिस्से में फैला हुआ था। सोवियत संघ के 15 गणतंत्र के नाम— रूस, बेलारूस, उक्रेनिया, लातविया, एस्तोनिया, लिथुआनिया, मल्दाविया, कज़ाख़्स्तान, तुर्कमेनिया, किर्गिज़िया, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, अरमेनिया, अज़रबैजान और जार्ज़िया थे। अब ये सभी गणतन्त्र अलग-अलग देश हैं। इनमें से कुछ गणतंत्र देश भी अलग अलग हिस्सों में बंट चुके हैं। इस तरह सोवियत संघ अभी तक कुल 21 हिस्सों में बिखर चुका है। रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी माना जाता है क्योंकि रूस का क्षेत्रफल इतना ज़्यादा है कि वह आज भी दुनिया का सबसे बड़ा देश माना जाता है।)
इसके बात के प्रमाण मिलते हैं कि उसी दौर में अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से कहा था कि वह अमेरिका से परमाणु बम बनाने की तकनीक ले लें और उसका परीक्षण कर लें। लेकिन पता नहीं क्या सोचकर (शायद गांधी के अहिंसावादी विचारों से प्रभापित होकर) नेहरु ने ऐसा नहीं किया। अब यह बात और है कि उस समय अगर वह परमाणु बम बनाने की तकनीक प्राप्त कर लेते तो शायद 1962 का दंश नहीं झेलना पड़ा। क्योंकि उक्त स्थिति में चीन भारत पर हमला करने की जुर्रत ही नहीं करता। इसके अलावा नेहरू को अपने राजनयिकों पर नहीं बल्कि गुटनिरपेक्ष देशों का भरोसा था। गुटनिरपेक्ष वह देश थे जो अपना बचाव ही स्वयं नहीं कर सकते थे वह भारत का बचाव क्या करते ? भारत की बेमेल रणनीति को समझकर विश्व की दो बड़ी ताकतें अमेरिका और सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ भी भारत की मदद करने नहीं आया। अब इससे बड़ी बेवकूफी क्या हो सकती है ?
अब नेहरू की तुलना में मोदी की विदेश नीति देखते हैं तो उनके बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने ने सारे अंडे एक ही टोकरी में नही रखे हैं, उन्होंने दुनियां के अधिकांश देशों से संपर्क स्थापित किया है। वो अमेरिका से भी जुड़े हुए हैं तो सीमा पर चीन को उसी की भाषा में जबाव देते हुए चीन से भी बातचीत कर रहे है। जबकि नेहरू के समय ऐसा नहीं था।
मोदी के नेतृत्व और विदेश नीति का कमाल है कि इसी दौर में अमेरिका, भारत को जी-7 (ग्रुप आफ सेवन) देशों में शामिल कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले वर्ष फ्रांस में आयोजित जी-7 के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था और उन्होंने वहां अपने विचार भी रखे थे। इसके अलावा लगभग सभी संभ्रांत वर्ग (एलीट ग्रुप) के शिखर सम्मेलनों में भारत पिछले सालो में शामिल हुआ है।
मोदी के नेतृत्व में भारत हथियार खरीदने के साथ इस रणनीति का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति के लिए भी कर रहा है। एक उदाहरण आप फ्रांस से ले सकते है, पिछले सालो में फ्रांस हर बड़े मुद्दे पर भारत के साथ खड़ा दिखता रहा है। इसका प्रमुख कारण फ्रांस के साथ हुआ सैन्य उपकरण समझौता ही है। यानी मोदी की विदेश नीति में व्यवहारिकता अधिक नजर आती है जबकि नेहरू की विदेश नीति किताबी बकैती ज्यादा कुछ नहीं ठहरती।
(बता दें, जी-7 दुनिया की सात सबसे बड़ी कथित विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों का समूह है, जिसमें 1-कनाडा, 2-फ्रांस, 3-जर्मनी, 4-इटली, 5-जापान, 6-ब्रिटेन और 7-अमरीका शामिल हैं। इसे ग्रुप ऑफ सेवन भी कहते हैं। जी-7 समूह खुद को मूल्यों का आदर करने वाला समुदाय मानता है। स्वतंत्रता, मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतंत्र और कानून का शासन, समृद्धि और सतत विकास, इसके प्रमुख सिद्धांत हैं। शुरुआत में यह कनाड़ा को छोड़कर 6 देशों का समूह था, जिसकी पहली बैठक वर्ष 1975 में हुई थी। इसके अगले वर्ष कनाडा भी इस समूह में शामिल हो गया और इस तरह यह जी-7 बन गया।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि ‘चीन’ दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवथा होने के बावजूद इस समूह का हिस्सा नहीं है। इसका कारण है कि चीन में दुनियां की सबसे बड़ी आबादी होने के चलते चीन में प्रति व्यक्ति आय व संपत्ति जी-7 समूह देशों के मुकाबले बहुत कम है। ऐसे में चीन को जी-7 में शामिल होने के लायक उन्नत या विकसित अर्थव्यवस्था नहीं माना जाता है। हालांकि चीन जी-20 देशों के समूह का हिस्सा है। इसके अलावा वर्ष 1998 में इस समूह में रूस भी शामिल हो गया था और यह समूह जी-7 से जी-8 बन गया था। लेकिन वर्ष 2014 में यूक्रेन से क्रीमिया हड़प लेने के बाद रूस को इस समूह से निलंबित कर दिया गया था। तब फिर से यह जी-7 हो गया।)
नेहरू की विदेश नीति में सबसे बड़ी कमी यही थी कि उनकी विदेश नीति पर भी व्यक्तिगत नजरिया हावी रहता था। वह देशहित नहीं बल्कि व्यक्तिगत हितों को लेकर निर्णय लेते रहे। इसके लेकर गाहे बगाहे सियासी गलियारों में चर्चा चलती रहती है कि नेहरू जब चीन दौरे पर गए थे तो वहां उनका काफी स्वागत हुआ था। चीन के प्रधानमंत्री ने उन्हें खाने के लिए एक पूरा बतख स्वयं आग में भूनकर खिलाया था। इस स्वागत से नेहरु गद्गद् हो गए और चीन पर हद से ज्यादा भरोसा कर बैठे थे। यही नहीं इस बात के भी प्रमाण हैं कि नेहरू विदेश यात्राओं में सरकारी धन से बेटी इंदिरा गांधी को भी साथ ले जाते थे। देखा जाए तो ऐसा अक्सर तब होता है, जब किसी नेता को अपने बाद किसी को बतौर नेता स्थापित करना हो। इसका मतलब साफ है कि नेहरू की सारी विदेश नीति अपनी आवभगत करवाने और अपने परिवार को लाभ दिलाने के इर्द गिर्द ही घूमती रही।
उस समय का माहौल देखा जाए तो स्थिति यह थी कि दुनियां भर में परिवर्तन हो रहे थे। दूसरे देशों में तख्ता पलट हो रहे थे। यही सब समझकर शायद नेहरु डर गए और उन्होंने सेना को ताकत सौंपने में रूचि नहीं दिखाई। पाकिस्तान व अन्य देशों में सैन्य ताकत और तख्तापलट के चलते शायद नेहरू ने सेना को जरूरी हथियार और दूसरे तरीकों से उस प्रकार से तैयार नहीं किया, जैसे उन्हें किया जाना चाहिए था। दूसरी तरफ चीन के पास दूसरे विश्वयुद्ध के हथियार मौजूद थे, जिनके दम पर पहले तो कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन में तख्तापलट कर सत्ता पाई, फिर उसने भारत पर हमला किया। भारत की आधी अधूरी तैयारियों का परिणाम सभी को पता ही है।
जो सेना बेहतर हथियार और सुरक्षा उपकरणों के लिए तरसती रहती थी मोदी के शासन काल में सेना को मजबूती प्रदान की गई। भारी मात्रा में सैन्य खरीदारी हो रही है। नेहरू के भारत में सैनिकों को युद्ध में दवा तक ढंग से नहीं मिल पाती थी। जबकि मोदी ने कायापलट ही कर दी है। पूरी बुलेट प्रूफ जैकेट का स्वदेशी उत्पादन करवाया। 15 के करीब प्राइवेट कंपनियों को सैन्य साजो सामान बनाने के लायसेंस दिए गये। साथ ही भारत जो हथियार खरीद रहा है उसमें भी कुशलता दिखा रहा है। वह किसी एक देश पर निर्भर न रहकर रूस, अमेरिका, फ्रांस से सुरक्षा उपकरण भी ले रहा है। ताकि यह देश भारत के समर्थक बने रहें। ये सैन्य समझौते ही इस बात का ठोस आधार है कि जिन देशों से रक्षा व्यापार हो रहा है वह देश भारत के खिलाफ नहीं होने वाले। वहीं भारत में स्वदेशी संस्था डीआरडीओ खुद भी सैन्य उपकरण बना ही रहा है।
(यहां डीआरडीओ के बारे में बता दें कि हिंदी भाषा में डीआरडीओ अर्थात् डिफेंस रिसर्च एंड डवलपमेंट आर्गनाइजेशन को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के नाम से जाना जाता है। भारत की रक्षा से जुड़े अनुसंधानिक गतिविधियों के लिये यह देश की शीर्ष संस्था है। यहां 5 हजार से अधिक वैज्ञानिक और लगभग 25 हजार से ज्यादा तकनीकी कर्मी कार्य करके देश को नई ताकत प्रदान कर रहे हैं। भारत की रक्षा के लिए आधुनिक हथियारों का निर्माण करना और नए-नए अनुसंधान करना ही डीआरडीओ की प्रमुख जिम्मेदारी है। डीआरडीओ की स्थापना सन 1958 मे की गयी थी। उस समय इसे रक्षा विज्ञान संस्थान के तकनीकी विभाग के रूप में स्थापित किया गया था। तब डीआरडीओ 10 प्रतिष्ठानों अथवा प्रयोगशालाओं वाला छोटा संगठन था। वर्तमान समय में डीआरडीओ एक व्यापक संगठन के रूप में विकसित हो चुका है। अब यह 50 से अधिक प्रयोगशालाओं का एक समूह है, जो विभिन्न प्रकार के संसाधनों जैसे वैमानिकी, आयुध, इलेक्ट्रॉनिक्स, युद्धक वाहन, इंजीनियरिंग प्रणाली, विशेष सैन्य उपकरण, मिसाइल, उन्नत कंप्यूटिंग और सिमुलेशन, नौसेना प्रणालियों, जीवन विज्ञान, प्रशिक्षण, सूचना प्रणालियों और कृषि को सुरक्षा देने वाली रक्षा प्रौद्योगिकियों का विकास करता है। कहना न होगा कि डीआरडीओ भारत को विश्व के सामने एक शक्ति के रूप में दिखाने के कार्य में प्रयत्नशील है।)
चीन से युद्ध के समय नेहरू ने वायुसेना को तिब्बत में चीन की सडकों और बड़े स्थानों पर बमबारी कर चीनी सैनिकों की सप्लाई चैन तोड़ने की अनुमति नहीं दी थी। यदि ऐसा होता तो जीत भारत की ओर आ सकती थी। लेकिन कारण क्या थे यह भगवान ही जानें ? लेकिन नेहरू अपने ही बनाए आभामंडल में डूब गये। जब चीन ने असम पर हमला किया तो नेहरू ने आल इंडिया रेडियो पर जो भाषण दिया वह उत्तर पूर्व के लोगो के लिए बेहद निराशाजनक और हार मान जाने वाला था। उस भाषण की प्रतिक्रिया यह हुई कि लंबे समय तक उत्तर पूर्व के अलगाववादी सगठन लोगों को उक्त भाषण का हवाला देकर कहते रहे भारत सरकार को उनसे कोई हमदर्दी नहीं है। भारत सरकार उन्हें बचाने नहीं आएगी। दूसरी ओर संसद में नेहरू ने अक्साई चीन, जिस पर चीन ने कब्जा कर लिया था उसके बारे में बोला कि ‘‘वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता , ऐसे स्थल को चीन ने ले लिया है तो ले जाने दो।’’
अब क्या इसको कोई राजनैतिक समझदारी बोलेगा ? नही ना ।
जबकि राजनैतिक समझदारी के मामले में मोदी को साबित करने की जरूरत नहीं कि सर्जिकल स्ट्राइक हो या पकिस्तान में घुसकर मारना हो अथवा एयर स्ट्राइक करना हो। उन्होंने हर मौकों पर राजनैतिक समझदारी का परिचय दिया है। उनके एक विशेष गुण की तारीफ करनी ही होगी कि वह अपने भाषणों से देश की जनता हो अथवा सैन्य बल उनमें उत्साह और मनोबल बढ़ाने में मोदी, नेहरू से कहीं अधिक काबिल वह नजर आते हैं। अब इसे कोई जुमलेबाजी कहता है तो भले ही कहता रहे। इससे उन पर कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता है।
अक्साई चीन पर तो चीन ने कब्जा ही कर लिया है। भारत ने 1962 के बाद अक्साई चीन को वापस लेने की कोशिश भी कभी नहीं की। अब विवाद यह है कि चीन, भारत की अन्य भूमि पर भी कब्जा करने की फिराक में है। जबकि भारत की कोशिश है कि वह चीन को कोई नया कब्जा ना करने दे। ऐसे में अभी यह सोचना बेमानी है कि हाल ही में भारत, अक्साई चीन को वापस चीन से छीन सकता है। इस भूल सुधार में दशकों का समय लग सकता है।
लेकिन एक उम्मीद यह नजर आती है कि यदि भविष्य में चीन टूटता है तो उसकी शक्ति कमजोर होगी तब उस पर हमला संभव हो जाएगा। क्योंकि समाजवादी गणतंत्र संघ भी बहुत ताकतवर था। कहा जाता है कि समाजवादी गणतंत्र संघ को कभी हराया नहीं जा सकता। लेकिन समय के साथ एक दिन यह मिथक भी टूट गया जिस प्रकार से समाजवादी गणतंत्र संघ 21 टुकड़ों में बिखरा है तब लोग इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यदि चीन में ऐसी कोई परिस्थिति बनती है, जिसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, तो यह भारत के लिए काफी फायदे वाली स्थिति होगी।
एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन की आबादी और उसका पूरा विकास चीन के पूर्वी क्षेत्रो में अधिक हुआ है। जबकि पश्चिमी क्षेत्र उसके लिए आर्थिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन वह भूभाग कब्जाने की नीयत से वहां नजरें गड़ाए रहता है। यदि जापान और दक्षिण कोरिया से उसका युद्ध होता है तब चीन अपने पूर्वी भाग को बचाने के लिए अपनी सेना और ताकत पूर्व में ले जाएगा, तब भारत के पास अक्साई चीन पर कब्जा करने का सुनहरा मौका बन सकता है। फिलहाल यह स्थिति कब आएगी यह समय के गर्भ में है। अभी हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि अखंड भारत की समृद्धि के लिए ऐसी स्थिति जल्द ही बने।