08 Nov
08Nov

अनिल शिवहरे

जालौन। किसी भी लोकतांत्रित देश के लिए वहां के लोगों के लिए वैचारिक स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण है। इसीलिए पत्रकारिता को लोकतंत्र को चार स्तंभों मंे सर्वाधिक महत्वपूर्ण मना जाता है। क्यों कि वह चारों को वैचारिक रूप से मजबूत करने का काम करता है। हाल ही में मुंबई और रायगढ़ की संयुक्त पुलिस द्वारा रिपब्लिक भारत के प्रधान संपादक को अर्नव गोस्वमी को गिरफ्तार किया और न्यायलय में पेश किया। जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। 


    पहले जान लेते हैं कि अर्नब गोस्वामी कौन हैं। अर्णव गोस्वामी का जन्म असम के गुवाहाटी शहर में 7 मार्च 1973 में हुआ था। वह एक प्रख्यात विधिवेत्ता असमिया परिवार से हैं। वह एक सेना अधिकारी के बेटे हैं। अर्णब ने अपने करियर की शुरुआत कोलकाता से प्रकाशित द टेलीग्राफ नामक अखबार से की। जहां उन्होनें एक वर्ष समाचार पत्र के संपादक के रूप में काम किया। एनडीटीवी और टाइम्स नाउ में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं और अब स्वयं के रिपब्लिक भारत टीवी पर राष्ट्रवाद की बातें करते नजर आते हैं। 

    अर्नव गोस्वामी को महाराष्ट्र की जनता द्वारा दिए गए जनादेश के आमराय के विपरीत गठजोड़ से बनी सरकार ने असंवैधानिक कार्यवाही करते हुए उन्हें जेल पहुंचा दिया। उसकी सार्वजनिक निंदा होनी ही चाहिए। देश के हर कोने से न केवल साहित्यकार व प्रिंट मीडिया से जुड़े खबरनवीस, सामाजिक संगठन बल्कि आम जन मन भी महाराष्ट्र की अगाड़ी सरकार के विरूद्ध सड़कों पर उतर खड़ी हुई है। इतना ही नहीं देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी को लनागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन बताया। मा. न्यायालय ने महाराष्ट्र विधान सभा की तानाशाहपूर्ण कार्यवाही को अवैध करार देते हुए विधानसभा के सचिव को तलब करते हुए न्यायालय की अवमानना का नोटिस थमाया है। वहीं, राज्य के मानवाधिकार आयोग जिसका गठन राज्य सरकारें ही करती हैं, उसने भी अर्नब की गिरफ्तारी को गैर कानूनी करार देते हुए गिरफ्तारी करने वाले एसपी से तमाम कानूनी जबाव मांगे। जनके उत्तर न देने पर पुनः उन्हें अगली तारीख पर जबाव देने के लिए सम्मन भेजा है। 

अर्नब गोस्वामी

    फिर भी बेशर्म उद्धव सरकार अर्नब को जेल से रिहा करने में आना कानी करती नजर आ रही है। इस संपूर्ण प्रकरण में सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि देश में जो भी समाचार जगत के प्रमुख चैनल हैं, जा समाज व राष्ट्र के सजग प्रहरी होने का दंभ भरते हैं। जिन्हें सजगता, निडरता व निष्पक्षता के लिए समय समय पर बड़े बड़े एवार्ड मिले हैं। जो कल तक इस उद्धव सरकार को सुशांत केस, कंगना रणावत व ड्रग्स मामलों पर दिन दिन भर कोई दूसरी न्यूज मजबूरी में दिखाते थे। 

    देश की छोटी छोटी घटनाओं पर कोई हल्ला बोल, दंगल, ताल ठोंककर तो कोई संविधान की बात शीर्षक से दिन में कई कई डिबेट कराते हैं। आज वह सिर्फ व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के चलते अर्नब मामले पर अपने मुंह पर ताला जड़े हैं। तो उन्हें जान लेना चाहिए के सत्ता के नशे में चूर रहने वाले राजनेताओं के हाथ कल उनकी गर्दन तक भी पहुंच जाएंगे। अर्नब मामले पर इलैक्ट्राॅनिक मीडिया की चुप्पी ही कल लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा साबित होगी। 

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