02 Feb
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जिस तरह देश में अन्न की आपूर्ति करने के लिये किसान महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार देश में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस भी महत्वपूर्ण है। एक देश की भूख मिटाता है, तो दूसरा देश की रक्षा करता है। लेकिन बीती 26 जनवरी को जो नजारा देश ने देखा, वह भयंकर था। भूख मिटाने वालों के नाम पर रक्षा करने वालों को ही खदेडा जा रहा था। क्या एक दिन का उपवास और प्रायश्चित कर ये ‘अन्नदाता’ अपने पाप से बच जाएंगे? 

            अन्नदाता! कहने का मतलब अपने सुख, सुविधाओं और लाभों की चिंता किए बिना सबका पेट भरने वाला। त्याग, समर्पण, सेवाभाव, बलिदान के लिए तत्पर रहने वाला और स्वाभिमान का नाम है किसान। क्या तथाकथित ‘किसान-अन्नदाता’ इन मर्यादाओं, जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को निभा पाए या सिर्फ, झूठी जिद्द और किसान आंदोलन के नाम पर केवल राजनीति और ताकत का प्रदर्शन हो रहा है? देश की आन-बान और शान को तार-तार कर और देश के जवानों के सम्मान को रौंद कर ‘किसान नेता’ क्या हासिल करना चाहते हैं?

         गणतंत्र दिवस पर देश की गरिमा-मर्यादा और तिरंगे की शान को देश-दुनिया में ठेस पहुंचाने वाले इन ‘किसान नेताओं’ को न तो शर्म आ रही है और न ही कोई पछतावा हो रहा है। शांति-सौहार्द और जय जवान-जय किसान तथा एकता का दंभ भरने वाले ‘किसान नेताओं’ ने गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड के नाम पर जिस तरह से दिल्ली और लाल किले पर तांडव किया, वह किसी से छिपा नहीं रह गया है। तथाकथित किसानों ने सारे वादों-शर्तों और पुलिस के निर्देशों को धता बताते हुए जिस तरह से राष्ट्रीय पर्व पर देश के सम्मान को क्षति पहुंचाई और साख पर बट्टा लगाया है, वह हम सबके सामने है।

            हाथों में मोटी-मोटी लाठियां, डंडे, भाले, फरसे, लोहे की रॉड और तलवारें लिए लोगों को वहां लेकर कौन गया था? तेज रफ्तार ट्रैक्टरों से करतब कर पुलिस और सुरक्षाबलों को रौंदने वाले और हथियारों से उन पर हमला करने वाले कहां से आए थे? अगर ये अराजक तत्व उनकी भीड़ में आ गए थे तो फिर किसान नेता और शांति के अलंबदार क्या कर रहे थे? उनकी तो हर जगह पैनी नजर थी। वह तो दावे कर रहे थे कि कोई भी परिंदा पर नहीं मार सकता है तो फिर वे इस हिंसा को क्यों नहीं रोक पाए? क्यों सुरक्षाबलों के साथ मिलकर इनको रोकने की कोशिश नहीं की?

          सवाल यह कि ये ‘किसान नेता’ सरकार पर बेबुनियाद आरोप मढ़कर अपनी रची साजिश और मंशा को छिपाना चाहते हैं। क्या उनके बोल, वायरल वीडियो और ट्रैक्टर परेड के दिन उनकी हरकतें-हकीकत सबकुछ झूठ है, जिसे सारे देश के लोगों और दुनिया ने देखा। इन ‘अन्नदाताओं’ ने ‘तिरंगा’ की आड़ में जो खेल खेला है, उसे देशवासी कभी माफ नहीं कर पाएंगे। उन्होंने गणतंत्र दिवस पर केवल ‘गण’ को ही ध्वस्त नहीं किया बल्कि ‘तंत्र’ को भी तार-तार कर दिया। जय जवान, जय किसान और तिरंगा की शान की आड़ में उन्होंने भारत के सम्मान को रौंदने के साथ अपने स्वाभिमान को भी मिट्टी में मिला दिया।

           इन किसानों नेताओं की ‘फौज’ ने सरकारी बसों, पुलिस की गाड़ियों, डिवाइडरों, उपकरणों को भारी क्षति पहुंचायी। यहां तक कि गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल झांकियों को भी अपना निशाना बनाया। लाल किले की प्राचीर पर पंथ का झंडा फहरा देना और धार्मिक नारेबाजी कर महजबी रंग देना, इनके मंसूबों और असलियत को खुद-ब-खुद बयां कर देता है। इसके बाद भी इन किसान नेताओं का यह कहना कि यह सरकार की साजिश है, यह कहते हुए इनकी आत्मा भी इन्हें नहीं धिक्कारती है! इस पर ये अपने को भोलाभाला किसान और अन्नदाता कह कर देश के लोगों की हमदर्दी बटोरना चाह रहे हैं।

             सत्य तो यह है कि, जिस कृषि बिल पर इतना बवाल हो रहा है, सरकार उसमें संशोधन और बातचीत के लिए पहले दिन से ही तैयार है। लेकिन तथाकथित किसान नेता बातचीत करना ही नहीं चाहते।            

             किसानों का नाम लेकर अपना उल्लू सीधा करने वाले कई लोग यहां हैं। जो अपने फायदे के लिये देश से गद्दारी करने से भी नहीं चूक रहे हैं। लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। देश के लोगों को इन ‘किसान नेताओं’ की असलियत पता चल चुकी है और अब यह खेल अधिक समय तक चलने वाला नहीं है। देश की आन बान और शान पर कीचड उछालने वालों पर सरकार को सख्त कार्यवाही करनी चाहिए। यही देश की जनता की मांग है। अगर ऐसा ना हुआ तो बार बार यह देश जलता रहेगा और बार बार तिरंगे का अपमान होता रहेगा।

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