25 Oct
25Oct

-पूर्वावलोकन-

1913 से शुरू हुए फिल्मों के सफर ने 100 वर्षों से अधिक समय मंे कितना सफर तय कर लिया है। इस पर कितना भी समेटने और लिखने की कोशिश करे बहुत कुछ छुटने का एहसास होता है। दुनिया की सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाली भारतीय फिल्म उद्योग समय से साथ आगे बढ़ता गया। निर्माता, निर्देशक, कलाकार और तकनीकें बदलती रही और उसके साथ भारतीय सिनेमा भी बदलता गया। धर्मिक और पौराणिक कथाओं से शुरुआत करनेवाला भारतीय सिनेमा बाजारवादी सिनेमा तक पहुंचते-पहुंचते कई करवटें ले चुका है। यथार्थवादी समांतर सिनेमा के काल में भारतीय सिनेमा जगत वैचारिक चोटी पर पहुंचा था। इस युग की फिल्मों को स्वर्णकालीन सिनेमा कहा जा सकता है। लेकिन पश्चिमी बाजारवाद के प्रभाव में आए सिनेमा ने रुपये कमाने मंे झंडे गाड़ने शुरू कर दिए। कालाकार या निर्माता रुपये कमाए अच्छी बात है। लेकिन रुपये कमाने के चक्कर में सिनेमा को भी उन्होंने बाजारू बना दिया।

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मदर इंडिया फिल्म का पोस्टर 

-आज फिल्में समाज को क्या दे रही हैं-

आज के दौर में भी कुछ फिल्में जैसे सलमान खान की हम आपके हैं कौन, आमिर खान की तारे जमीं पर, सनी देओल की गदर: एक प्रेम कथा, शाहरूख खान की स्वदेश, अक्षय कुमार की टाॅयलेट: एक प्रेम कथा, नवाजुद्दीन सिद्दीकी की माउंटेन मैन: द मांझी, तापसी पन्नू व भूमि पेडनेकर की सांड की आंख, रानी मुखर्जी की मर्दानी, अमिताभ बच्चन तापसी पन्नू की पिंक आदि इक्का दुक्का फिल्में हैं जो समाज को संदेश देने का काम करती हैं। वरना अधिकांश फिल्में तो परिवार के साथ बैठकर देखने लायक नहीं होती हैं। यहां एक फिल्मकार का व्यंग्य याद आ रहा है, जिन्होंने कहा था कि आज के समय मंे भी परिवार एक साथ फिल्म देखता है लेकिन अलग अलग टीवी पर। 

    आज फिल्मों में अश्लीलता को बुरा नहीं माना जाता है। जो अभिनेत्री जितने कम कपड़े पहनेगी उसे लगता है कि वह उतनी ही अधिक सफल होगी। फिल्मों में पार्टियों में शराब और नशे के सेवन को दिखाना आम है। भी हाल ही में एक नया विषय शुरू हो गया है, ‘लिव इन रिलेशनशिप’ इसका ठीक ठीक हिन्दी अर्थ तो मुझे नहीं पता लेकिन जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है उसके अनुसार बिना शादी किए लड़का और लड़की का एक साथ रहकर दंपत्ति की तरह रहना, जिसमें एक दूसरे के लिए कोई बाध्यता न हो, इसे ही लिव इन रिलेशनशिप का नाम दिया गया है। अब में पूछना चाहता हूं कि क्या भारतीय संस्कृति यही सिखाती है। यह पश्चिमी देशों के लिए हो सकता है कि सही रहा हो। लेकिन भारत मंे विवाह पारिवारिक संस्कृति को कायम रखने की व्यवस्था है। जहां पति पत्नी के प्रति जिम्मेदार होता है। पत्नी भी पति एवं उसके परिवार की जिम्मेदारी ओढ़ती है। महानगरों में फिल्मों को देखकर यह संस्कृति जन्म ले चुकी है। डर है कि कहीं भारत में भी बूढ़े माता पिता को अपने अंतिम दिनों मंे अनाथ की तरह जीवन न गुजारना पड़े। या उन्हें अंतिम दिनों मंे किसी वृद्धाश्रम में रहकर अपने बेटे के इंतजार में रहकर दम न तोड़ देना पड़े। यदि इस पर रोक न लगाई गई तो यह दिन भी दूर नहीं होगा। 

-बाॅलीवुड का काला सच-

    हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच में बाॅलीवुड के कई और गंदे राज सामने आए हैं। यहां हम इसमें नहीं पड़ना चाहते हैं कि सुशांत की मौत हत्या थी अथवा आत्म हत्या लेकिन उनकी मौत के बाद जो गंदगी सामने आई है उस पर जरूर बात करना चाहूंगा। इसमें पता चला कि नशे की दुनियां सिर्फ फिल्मों में ही नहीं दिखाई जाती बल्कि इस नशे की दुनियां से बाॅलीवुड के अभिनेता और अभिनेत्रियां अपने असल जीवन मंे गहरे तक जुड़े हैं। कमाई का एक बड़ा हिस्सा नशे को पूरा करने मंे खर्च किया जाता है। अब रूपया आया है तो उसे खर्च भी करना है। रुपये आने पर दो चीजें व्यक्ति में सबसे पहले घर कर जाती हैं। एक नशा दूसरा अय्याशी और इससे फिल्मी सितारे भी दूर नहीं हैं। क्या गजब का तालमेल बैठाया है वाकई में यहां आदमी और औरत का कोई फर्क नहीं है। दोनों ही समान से रूप से इस नशे और अय्याशी से जुड़े हैं। कई फिल्मी सितारों के नाम सामने आए हैं। उनके नाम आप सभी पूर्व में अन्य खबरों पर पढ़ ही चुके होंगे। 

    कहते हैं कि कला और कलाकार को धर्म, क्षेत्र और भाषा के दायरे में रख कर देखना और बांधना दोनों ही गलत है। हमारी संस्कृति अनुसार तो व्यक्ति के गुण किसी के मोहताज नहीं होते। गुणों की महक चारों दिशाओं में फैल जाती है। वह किसी की मोहताज नहीं होती। यह भी कहा गया है कि व्यक्ति के पहुंचने से पहले उसके गुणों या अवगुणों के कारण बनी उसकी महक उससे पहले पहुंच जाती है। कला और कलाकार को लेकर अतीत में कहीं बातें आज भी सार्थक हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कला और कलाकार को धन के तराजू पर तोलकर देखा जाने लगता है। तब फिर धन आने के साथ उसमें वह सब गुण-अवगुण जुड़ जाते हैं, जिन्हें समाज सही नहीं मानता है। इस वर्ग का विरला ही इस चक्रव्यूह से अर्जुन की तरह बाहर निकलने की क्षमता रखता है। अधिकतर को तो अभिमन्यु की तरह सभी ओर से घिरकर जीवन ही बर्बाद कर लेते हैं। इन्हें हमारे समाज का युवा वर्ग अपना पथ प्रदर्शक मानता है। उनकी नकल अपने दैनिक जीवन और आचार व्यवहार में करता है। क्या इनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि कोई ऐसा कार्य न करें जिससे इन्हें अपना आदर्श समझने वाले युवाओं के सपने न टूटें। 


    अंत में मेरा मानना है कि भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को खेल बोर्ड की तर्ज पर ऐसे नियम कानून बनाने चाहिए जिससे समाज में सकारात्मक संदेश जाए। जैसे खेल बोर्ड किसी खिलाड़ी की जांच में उसे नशे का सेवन करते हुए पकड़ता है तो उस पर 6 माह, 1 साल, 5 साल या आजीवन प्रतिबंध लगा देता है। इसी प्रकार नशे की गिरफ्त में फंसे फिल्मी सितारों की भी समय समय पर जांच कराई जाए। यदि वह नशे का सेवन करते हैं तो उन्हें फिल्मों में लेने पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा देना चाहिए। कोई समाज विरोधी आचरण में लिप्त पाया जाता है तो उसे आजीवन प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। कुछ ऐसे नियम कायदे होंगे तभी समस्या का कुछ हल होगा। अन्यथा युवा इन नशेबाजों की राह पर चलकर अपने जीवन को बर्बाद करते रहेंगे। भारतीय फिल्म को बाजार के लिए बनाया जाए न कि फिल्म को बाजारू बनाया जाए, तभी फिल्म जगत का भविष्य तेजोमय होगा। 

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