•  25-10-2020 08:01 PM

1913 से शुरू हुए फिल्मों के सफर ने 100 वर्षों से अधिक समय मंे कितना सफर तय कर लिया है। इस पर कितना भी समेटने और लिखने की कोशिश करे बहुत कुछ छुटने का एहसास होता है। दुनिया की सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाली भारतीय फिल्म उद्योग समय से साथ आगे बढ़ता गया। निर्माता, निर्देशक, कलाकार और तकनीकें बदलती रही और उसके साथ भारतीय सिनेमा भी बदलता गया। धर्मिक और पौराणिक कथाओं से शुरुआत करनेवाला भारतीय सिनेमा बाजारवादी सिनेमा तक पहुंचते-पहुंचते कई करवटें ले चुका है। यथार्थवादी समांतर सिनेमा के काल में भारतीय सिनेमा जगत वैचारिक चोटी पर पहुंचा था। इस युग की फिल्मों को स्वर्णकालीन सिनेमा कहा जा सकता है। लेकिन पश्चिमी बाजारवाद के प्रभाव में आए सिनेमा ने रुपये कमाने मंे झंडे गाड़ने शुरू कर दिए। कालाकार या निर्माता रुपये कमाए अच्छी बात है। लेकिन रुपये कमाने के चक्कर में सिनेमा को भी उन्होंने बाजारू बना दिया।

पूरा पढ़ें
  •  25-10-2020 07:31 PM

सिनेमा, जो समाज का दर्पण कहलता है। सिनेमा, समाज को बदलने का दमखम रखता है। सिनेमा और उसमें काम करने वाले अभिनेता व अभिनेत्रियों से प्रभावित होकर युवा उन्हीं के जैसा बनने का प्रयास करते हैं। ऐसे में नए दौर के अभिनेता और अभिनेत्रियां इस समाज को क्या दे रहे हैं, इसी विषय पर चूंकि लेख थोड़ा बड़ा है इसलिए इसे दो भागों मंे प्रस्तुत किया जा रहा है। पहला भाग भारतीय फिल्मों का स्वर्णिम युग और दूसरा फिल्म जगत का स्याह पक्ष

पूरा पढ़ें
I BUILT MY SITE FOR FREE USING