क्या आप जानते हैं, भगवान शिव द्वारा गणेशजी का सिर काटने के बाद श्रीगणेश ने हाथी का शीश ही क्यों लिया?   : जावेद अख्तर

जालौन। बचपन से एक कहानी सुनते आ रहे हैं कि भगवान शिव ने अपने ही पुत्र श्रीगणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया था। (यहां हम उस कहानी के विस्तार में नहीं जाना चाह रहे हैं, उसकी चर्चा फिर कभी होगी) इसके बाद श्रीगणेश के सिर पर एक गज (हाथी) का सिर काटकर लगाया गया। यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि विघ्नहर्ता श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना गया है अर्थात् सभी देवों में प्रथम पूज्य श्रीगणेश ही हैं।

           इस कहानी को सुनकर और पढ़कर मन में एक जिज्ञासा थी कि श्री गणेश को हाथी का ही सिर क्यों लगाया गया। आखिर क्या कारण था कि स्वयं श्रीगणेश अथवा किसी अन्य का सिर क्यों नहीं लगाया गया। इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए काफी खोजबीन की और साहित्यों को खंगाला। उसमें जो कुछ मुझे ज्ञात हुआ मुझे लगता है कि उसे अन्य लोगों को भी जानना चाहिए। क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर कई लोगों को पता नहीं है। बात को ज्यादा आगे न बढ़ाते हुए विषय पर आते हैं।

         गज और असुर के संयोग से एक असुर जन्मा-गजासुर। उसका मुख गज जैसा होने के कारण उसे गजासुर कहा जाने लगा। गजासुर भगवान शिव का बड़ा भक्त था और शिवजी के बिना अपनी कल्पना ही नहीं करता था। उसकी भक्ति से भोले भंडारी गजासुर पर प्रसन्न हो गए। एक बार वह गजासुर के समक्ष प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। गजासुर ने कहा- ‘‘प्रभु आपकी आराधना में कीट-पक्षियों द्वारा विघ्न उत्पन्न होता है। इसलिए कीट पतंगों द्वारा होने वाले विघ्न से मुक्ति चाहिए। इसके लिए मेरी इच्छा है कि मेरे शरीर से हमेशा तेज अग्नि निकलती रहे, जिससे कोई पास न आए और मैं निर्विघ्न आपकी अराधना करता रहूं। महादेव ने गजासुर को उसका मनचाहा वरदान दे दिया। वरदान पाकर गजासुर फिर से निर्विघ्न शिवजी की साधना में लीन हो गया।

       हजारों साल के घोर तप से शिवजी फिर प्रकट हुए और कहा- ‘‘गजासुर, तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर पूर्व में भी मैंने तुम्हें मनचाहा वरदान दिया था। अब मैं फिर से प्रसन्न हूं, बोलो अब क्या मांगते हो?’’ गजासुर कुछ इच्छा लेकर तो तप कर नहीं रहा था। उसे तो शिव आराधना के सिवा और कोई काम पसंद ही नहीं था। लेकिन जब उसके प्रभु ने कहा कि वरदान मांगो तो वह सोचने लगा।

       गजासुर ने कहा- ‘‘वैसे तो मैंने कुछ इच्छा रखकर तप नहीं किया है। लेकिन आप कुछ देना ही चाहते हैं तो आप कैलाश छोड़कर मेरे उदर (पेट) में ही निवास करें। भोले तो वैसे भी भंडारी हैं। गजासुर की इच्छानुसार वह कैलाश छोड़कर गजासुर के पेट में ही समा गए।

        जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव, माता पार्वती को नहीं मिले तो उन्होंने शिवजी को खोजना शुरू किया। सभी संभावित स्थानों पर तलाश करने के बाद भी जब उन्हें कहीं शिवजी नहीं मिले तो उन्होंने विष्णुजी का स्मरण किया और उनसे शिवजी का पता लगाने को कहा।

        श्रीहरि ने कहा- ‘‘बहन आप दुखी न हों। भोले भंडारी से कोई कुछ भी मांग ले तो दे देते हैं। गजासुर को दिए वरदान स्वरूप वह गजासुर के उदर में वास कर रहे हैं। तब पार्वती ने श्रीहरि से समस्या का हल निकालने के लिए कहा।

       श्रीहरि ने एक लीला की। उन्होंने नंदी बैल को नृत्य का प्रशिक्षण दिया और फिर उसे खूब सजाने के बाद गजासुर के सामने जाकर नाचने को कहा। श्रीहरि स्वयं एक ग्वाले के रूप में आए और बांसुरी बजाने लगे। बांसुरी की धुन पर नंदी ने ऐसा सुंदर नृत्य किया कि गजासुर बहुत प्रसन्न हो गया। उसने ग्वाला वेशधारी श्रीहरि से कहा-‘‘मैं तुम पर प्रसन्न हूं। इतने साल की साधना से मुझमें वैराग्य आ गया था। तुम दोनों ने मेरा मनोरंजन किया है। मूुझे प्रसन्न करने पर कोई वरदान मांग लो।’’

      श्रीहरि ने कहा- ‘‘आप तो परम शिवभक्त हैं। शिवजी की कृपा से ऐसी कोई चीज नहीं जो आप हमें न दे सकें। किंतु मांगते हुए संकोच होता है कि कहीं आप मना न कर दें।’’ श्रीहरि की तारीफ से गजासुर स्वयं को ईश्वरतुल्य ही समझने लगा। उसने कहा- ‘‘तुम मुझे साक्षात शिव समझ सकते हो। मेरे लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं। तुम्हें मनचाहा वरदान देने का वचन देता हूं।’’

       श्रीहरि ने फिर कहा- ‘‘आप अपने वचन से पीछे तो न हटेंगे।’’ गजासुर ने धर्म को साक्षी रखकर हामी भरी तो श्रीहरि ने उससे शिवजी को अपने उदर से मुक्त करने का वरदान मांगा। गजासुर वचनबद्ध था, वह समझ गया कि उसके पेट में बसे शिवजी का रहस्य जानने वाला यह कोई साधारण ग्वाला नहीं है, जरूर स्वयं भगवान विष्णु आए हैं।

       वचन के अनुसार उसने शिवजी को उदर से मुक्त किया और शिवजी से एक आखिरी वरदान मांगा। उसने कहा- ‘‘प्रभु आपको उदर में लेने के पीछे किसी का अहित करने की मंशा नहीं थी। मैं तो बस इतना चाहता था कि आपके साथ मुझे भी स्मरण किया जाए। शरीर से आपका त्याग करने के बाद वैसे भी जीवन का कोई मोल नहीं रहा। इसलिए प्रभु मुझे वरदान दीजिए कि मेरे शरीर का कोई एक अंश हमेशा आपके साथ पूजित हो।’’ शिवजी ने उसे वह वरदान दे दिया।

        श्रीहरि ने कहा- ‘‘गजासुर तुम्हारी शिवभक्ति अद्भुत है। शिव आराधना में लगे रहो। समय आने पर तुम्हें ऐसा सम्मान मिलेगा जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी।

         उक्त कहानी के परिपेक्ष्य में जब गणेशजी का शीश धड़ से अलग हुआ तो गजासुर के शीश को ही श्रीहरि काट लाए और गणपति के धड़ से जोड़कर उन्हें जीवित किया था। इस तरह वह शिवजी के प्रिय पुत्र के रूप में श्रीगणेश के मुख रूप में वह भी प्रथम आराध्य हो गया।

एक अन्य कथा के अनुसार

गजासुर ने भगवान शिव को लिंग रूप में हृदय में वसने का वरदान मांगा था। लेकिन वरदान पाकर गजासुर के अत्याचार बढ़ गए। देवताओं ने उसे मारने की सोची लेकिन अस्त्र शत्र गजासुर के पास पहुंचते ही उसके हृदय में शिवलिंग में बसे भगवान शिव को देखकर झुककर गिर जाते। 

              तब नारदमुनि ने उपाय बताया कि गजासुर के सामने शिव स्तुति की जाए। शिव स्तुति सुनकर लिंग बढ़ता है। जब सभी देवताओं ने मिलकर शिवस्तुति की तो लिंग बढ़ता हुआ गजासुर के हृदय को फाड़कर बाहर आ गया।

             तब गजासुर को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने भगवान शिव से अपने से अलग न होने का वर मांगा। उसी वरदान के फलस्वरूप श्रीगणेश को गजासुर का सिर लगाया गया। 

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