नवरारत्रि का धार्मिक और वैज्ञानिक आधार 17-10-2020

जालौन। ‘नवरात्रि’ जो मातृ शक्ति का पर्व है। इन 9 दिनों में पूरा माहौल भक्तिमय होगा। देवी के 9 स्वरूपों की पूजा अर्चना एवं ‘जय माता दी’ के साथ भक्ति अपने चरम पर होगी। नवरात्रि के 9 देवी स्वरूपों एवं पूजन विधि आदि के बारे में आप सभी ने खूब पढ़ा होगा। यहां हम आपका महत्वपूर्ण समय देवी के स्वरूप एवं पूजा विधि आदि पर खर्च नहीं करेंगे। बल्कि हम नवरात्रि के वैज्ञानिक आधार के बारे में आपको बताना चाहेंगे। हमें हमारे पूर्वजों से कोई भी पर्व बिना किसी वैज्ञानिक आधार के हमें विरासत में नहीं मिला है। बल्कि प्रत्येक पर्व के पीछे कुछ महत्वपूर्ण कारक हैं, उन्हीं के बारे में हम यहां चर्चा करेंगे। 

नवरात्रि का धार्मिक आधार     

    नवरात्र शब्द से ‘नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध’ होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि ‘रात्रि’ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते। 

    नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं। मनीषियों ने वर्ष में चार बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है। इसके अलावा दो इनके बीच दो गुप्त नवरात्र और होते हैं। जिन्हें तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए उपयुक्त माना जाता है। वहीं, सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। देवी भक्त अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते, वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

नवरात्रि का वैज्ञानिक आधार

    मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे। आप अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है, किंतु यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। इसे आप इस प्रकार से समझ सकते हैं कि वायरलैस पर दिन के समय की अपेक्षा रात के समय आवाज को अधिक स्पष्टता से सुना जा सकता है। यही रात्रि का तर्कसंगत रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपनी शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

    नवरात्रि का समय वह समय होता है जब ऋतु बदलती है। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक व मानसिक बीमारियां बढ़ती हैं। अतः उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णतः स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है। यही वह समय होता है जब मौसम बदलता है। जिससे शरीर और मन में रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है। ऋतुओं के संधिकाल में आसुरी शक्तियां (रोगणुओं) को नष्ट करने के लिए एवं स्वस्थ्य रहने के लिए वातावरण शुद्ध करने एवं शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता होती है। नवरात्रि पर जहां हवन पूजन करने से वातावरण शुद्ध होता है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। वहीं, व्रत रखने से शरीर और मन के विकार दूर होते हैं। शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और मन नए उत्साह के साथ कार्यों को करने के लिए तैयार हो जाता है। 

    हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए सफाई या शुद्धि तो हम प्रतिदिन करते ही हैं। किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। इस समय व्रत करने से न केवल मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। बल्कि शरीर और विचारों की भी शुद्धि होती है। जिसमें सात्विक आहार एवं व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमशः मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है। जिस प्रकार से हम नहाकर अपने शरीर की सफाई करते हैं। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा है। इन मुख्य इन्द्रियों में अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए शरीर के नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नवरात्रि मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए 9 देवी स्वरूपों में परिवर्तित किया गया है। इसलिए मात्र धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवरात्र का विशेष महत्व है। जिसके लिए देवी प्रतीकों के पूजन के अलावा शरीर और मन को भी आने वाले समय में क्रियाशील रखने के लिए प्रयत्न करें।


यह नवरात्रि आपको, आपके परिवार और इष्ट मित्रों के लिए शुभ फलदायक सिद्ध हो यही सुरभि संदेश परिवार की कामना है। 

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