
जालौन। लुटियंस दिल्ली की रातों में ना जाने कितने किस्से दफन हैं, जो जब भी बाहर आते हैं तो किसी ना किसी बड़े नाम को छिछला कर जाते हैं। अब वह प्रसिद्ध नीरा राडिया केस हो या स्वर्गीय अमर सिंह द्वारा कांग्रेस परिवार के शिरोधारी चाटुकार मणिशंकर अय्यर की जमकर की गई जूत पैजारी हो।
तो किस्सा कुछ यूं है कि सन 2000 में चित्रकार सतीश गुजराल ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के मीडिया सलहकर एचके दुआ के सम्मान में दिल्ली में एक पार्टी का आयोजन किया था। पार्टी में दिल्ली के नामी-गिरामी लोग पहुंचे थे। कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर भी पार्टी की शोभा बढ़ाने आये हुए थे। जैसा कि अक्सर दिल्ली की पार्टियों में होता है, शराब अपने पूरे शबाब पर थी।
शराब के नशे में धुत्त मणिशंकर पहुँच गए अमर सिंह के पास, जो उस समय समाजवादी पार्टी के एकमात्र ऐसे नेता थे जिन्हें इस तरह की पार्टियों में बुलाया जाता था। अब आप पूछेंगे कि अय्यर साहब भरी पार्टी में सीधा अमर सिंह के पास ही क्यों पहुंचे, इसके पीछे की कहानी जान लीजिए, उसके बाद पार्टी की आगे की कहानी पढ़िएगा ...
आपको याद होगा कि जब बाजपेयी जी की सरकार सदन में एक वोट से गिरी थी तो सोनिया गाँधी की खुशी का ठिकाना नहीं था। तत्कालीन मीडिया की खबरों के अनुसार शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए सोनिया गांधी की माँ और बहन भी इटली से दिल्ली पहुँच चुकी थीं। पर ऐन वक्त पर मुलायम सिंह यादव ने भाँजी मार दी। उन्हें लगा कि भारत का प्रधानमंत्री बनने का उनका भी यह सुनहरा मौका है तो मुलायम सिंह ने विदेशी मूल की बात कह कर कांग्रेस नेतृत्व को को समर्थन देने से इनकार कर दिया और साफ कह दिया कि वह सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली किसी भी सरकार का समर्थन नहीं करेंगे।
अब सोनिया गाँधी करें भी तो क्या करें! मुलायम के समर्थन के बिना उनकी सरकार बन नहीं सकती थी। फिर भी वह हिम्मत जुटा कर राष्ट्रपति के पास 242 सांसदों का समर्थन पत्र ले कर चली गईं और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। उन्होंने सोचा कि एक बार राष्ट्रपति महोदय ने उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया तो उन्हें पंद्रह-बीस दिन का समय मिल जायेगा। इस दौरान सांप्रदायिक ताकतों की दुहाई दे कर मुलायम के ऊपर दबाव बनाया जायेगा और उन्हें विश्वास मत के दौरान समर्थन के लिए मजबूर किया जाएगा।
पर राष्ट्रपति केआर नारायणन भी मजबूर थे। वह दिल से चाहते हुए भी सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री बनने का न्योता नहीं दे पा रहे थे। क्यूंकि तेरह महीने पहले ही उन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी को तब तक प्रधानमंत्री बनने के लिए आमंत्रित नहीं किया था जब तक कुछ खास मंत्रालय लेने के लिए कोप भवन में बैठी जयललिता ने अपने सांसदों का समर्थन पत्र उन्हें नहीं दे दिया। अंत में यह हुआ कि राष्ट्रपति महोदय के यहां से सोनिया गाँधी को खाली हाथ लौटाना पड़ा। सोनिया गाँधी का प्रधानमंत्री बनने का सपना चकनाचूर हो गया।
कांग्रेसी नेताओं से अपने नेता का यह दुःख देखा नहीं गया। वो जब भी और जहाँ भी मौका मिलता, खलनायक मुलायम सिंह यादव को जी भर कर कोसते। उस समय समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह अगर पार्टी पर काबिज थे तो अमर सिंह टेलीविजन पर दिन भर छाया रहने वाला समाजवादी चेहरा थे।
तो चलिए, अब हम पार्टी की कहानी की ओर वापस चलते हैं ...
सतीश गुजराल की पार्टी में पैग चढाने के बाद गांधी परिवार के सेवक मणिशंकर अय्यर के अन्दर का गुस्सा जोर मारने लगा। कांग्रेस की क्वीन के प्रति अपनी बफादारी साबित करने का यह एक सुनहरा मौका था। तो अय्यर साहब पहुँच गए अमर सिंह के पास, जो दो-चार अन्य मेहमानों के साथ बातों में मशगूल थे।
मणिशंकर ने अमर सिंह से कहा, ‘‘तुम नस्लभेदी हो, तुमने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया, बस इसलिए क्योंकि वह विदेशी महिला हैं।’’ अमर सिंह ने सफाई दी, ‘‘इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है यह समाजवादी संसदीय बोर्ड द्वारा लिया गया एक फैसला था, जिसे एक प्रवक्ता होने के नाते मैंने प्रस्तुत किया।’’
मणिशंकर ने जब देखा कि वह अमर सिंह को उकसाने में सफल नहीं हुए हैं तो उन्होंने अमर सिंह पर व्यक्तिगत हमला बोला, ‘‘तुम एक दलाल हो, तुम अंबानी के पालतू कुत्ते हो।’’ अमर सिंह ने फिर भी अपने गुस्से को काबू में रखते हुए पलटवार किया, ‘‘ मणि ये तू नहीं, शराब बोल रही है! तुझे नहीं पता, पर सब देख रहे हैं कि नशे में धुत्त तेरा सारा शरीर कैसे डोल रहा है।’’
मणिशंकर के उकसाने के बाद भी जब मणि ने देखा कि इसका अमर सिंह पर कोई असर ही नहीं हो रहा है, तो उन्होंने सिंह को ललकारा, ‘‘तू किस प्रकार का ठाकुर है ? तू तो एक मा..............द है। इस पर अमर क्रोधित हो उठे, पर तब भी उन्होंने संयम बनाये रखा। कहा, ‘‘मैं भी तुम्हारी मां को गाली दे सकता हूं, पर मैं तुम्हारी तरह नीचे नहीं हूं भगवान के लिए मेरे अंदर के राक्षस को मत जगाओ।’’
पारा चढ़ता देखने के बाद भी मणि नहीं रुके। उनके सर पर तो मानो शैतान सवार था। उन्होंने कहा, ‘‘तुम लोग हम आक्सफोर्ड और कैंब्रिज वालों की क्या बराबरी करोगे। तुम्हारा नेता तो अंग्रेजी में अपना खुद का परिचय देने के काबिल भी नहीं है। तुम्हें पता है तुम्हारा नेता बिल्कुल मेरी तरह दिखता है, ........... जानते हो मेरे पिता यूपी में बहुत घूमने जाते थे।
मणि की यह सड़कछाप हरकत तो अच्छे-अच्छों को हिला कर रख देती तो अमर सिंह भला क्या चीज थे। अपने नेता की माँ के बारे में ऐसे अपशब्द सुन कर अमर सिंह के सब्र का बाँध टूट पड़ा। उन्होंने आव देखा न ताव, अय्यर की गर्दन पकड़ी और उनके ऊपर लात-घूंसों की बौछार कर दी। अय्यर पिटते रहे और लोग देखते रहे। पार्टी में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने अय्यर को बचाने की कोशिश नहीं की। मानो सभी को इस शुभ दिन का बरसों से इंतजार था।
इस घटना के बाद मणि शंकर अय्यर तीन महीने तक सार्वजनिक जीवन से गायब रहे।
यह पूरी घटना विस्तार से टाइम्स ऑफ इंडिया के 3 दिसम्बर 2000 के अंक में छपी थी।
स्वर्गीय अमर सिंह के मीडिया को दिए एक बयान के अनुसार ''मणि सिर्फ मुझसे उलझने के लिए उतावले हो रहे थे, ताकि वे जाकर सोनिया गांधी को बता सकें कि उन्होंने अमर सिंह से बदला ले लिया है। इसके बदले उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी में जगह मिल सके।'' अमरसिंह ने बताया था कि ''मुलायम सिंह उनके दिल के काफी करीब रहे हैं। वे उनके खिलाफ किसी बदजुबानी को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। अमर कहते हैं कि जब मणि ने मेरे नेता की मां के बारे में अपशब्द कहे तो मैं उस समय सही-गलत सब भूल गया था।''
आमतौर पर जिसकी पिटाई होती है, उसे सहानुभूति मिलती है। लेकिन उस मामले में मणि के साथ ऐसा नहीं हुआ। उस झड़प ने इतनी प्रसिद्धी पाई कि जब मणि शंकर अय्यर संसद के प्रांगण में किसी को बेइज्जत करने खड़े होते थे, तो सामने वाला कहता था ‘‘मणिशंकर चुप हो जा! नहीं तो अमर सिंह आ जाएगा।’’
