जालौन। नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे टेसू और झिंझिया मांगने में लगे हुए है। किसी जमाने में अपने अनोखे प्रेम के लिए सुविख्यात टेसू और झिंझिया विवाह परंपरा को लेकर आज की युवा पीढ़ी में आकर्षण कम होता जा रहा है। दीपावली से पूर्व मनाए जाने वाले इस पर्व का ऐतिहासिक महत्व है जो महाभारत की घटना पर आधारित है। टेसू-झिंझिया के विवाह के बाद हिंदू धर्म में विवाह व मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।
अगर हम इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पता चलता है कि टेसू और झिंझिया की प्रेम कहानी ऐसी है जो युद्ध की दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई। लेकिन उनके सच्चे प्रेम की उस तस्वीर की झलक आज भी यदाकदा देखने को मिल ही जाती है। हालांकि शहर के लोग तो इसे लगभग पूरी तरह भूल ही चुके हैं। लेकिन गांवों में कुछ हद तक यह परंपरा अभी भी जीवित है। जहां आज भी टेसू-झिंझिया का विवाह बच्चों व युवाओं द्वारा रीति-रिवाज व पूरे उत्साह के साथ कराया जाता है। जो इस बात का प्रतीक है कि अपनी प्राचीन परंपरा को सहेजने में गांव आज भी शहरों से कई गुना आगे हैं।
‘‘अड़ता रहा टेसू, नाचती रही झिंझिया,’’
‘‘टेसू अटर करै, टेसू मटर करै, टेसू लैई कै टरै,’’ ‘
‘टेसू गया टेसन से पानी पिया बेसन से,’’ और
‘‘नाच मेरी झिंझरिया’’
आदि गीतों को गाकर उछलती-कूदती बच्चों की टोली आपने जरूर देखी होगी। हाथों में पुतला और तेल का दीपक लिए यह टोली घर-घर जाकर चंदे के लिए रुपये मांगती है। तो लड़कियां झिंझियां लेकर अनाज मांगने के लिए आती हैं। कोई गाने गवाकर इनसे मजा लेता है तो कोई इन्हें अपने द्वार से खाली हाथ ही लौटा देता है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में बच्चों की ये टोलियां बहुत ही कम दिखाई देती हैं।
किवदंती हैं कि भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक जिसे बुंदेलखंड में भौमासुर भी कहते हैं, को महाभारत का युद्ध देखने आते समय झिंझिया को देखते ही प्रेम हो गया। जब झिंझिया ने विवाह का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने युद्ध से लौटकर झिंझिया को विवाह का वचन दिया। लेकिन अपनी मां को दिए वचन, कि हारने वाले पक्ष की तरफ से वह युद्ध करेंगे, के चलते वह कौरवों की तरफ से युद्ध करने आ गए और श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट दिया। वरदान के चलते सिर कटने के बाद भी वह जीवित रहे और उन्होंने अपने कटे सिर से महाभारत का युद्ध देखा। युद्ध के बाद मां ने विवाह के लिए मना कर दिया। इस पर बर्बरीक ने जल समाधि ले ली। झिंझिया उसी नदी किनारे टेर लगाती रही लेकिन वह लौट कर नहीं आए। इस तरह एक प्रेम कहानी का अंत हो गया।
उसी परंपरा को जीवित बनाए रखने के उद्देश्य से टेसू-झिंझिया नामक यह खेल बच्चों द्वारा नवमी से पूर्णमासी तक खेला जाता है। इससे पहले 16 दिन तक बालिकाएं गोबर से चांद-तरैयां व सांझी माता बनाकर सांझी खेलती हैं। वहीं नवमी को सुअटा की प्रतिमा बनाकर टेसू-झिंझिया के विवाह की तैयारियों में लग जाती हैं।
पूर्णमासी की रात को टेसू-झिंझिया का विवाह पूरे उत्साह के साथ बच्चों द्वारा किया जाता है। वहीं मोहल्ले की महिलाएं व बड़े-बुजुर्ग भी इस उत्सव में भाग लेते हैं। प्रयास किये जाते कि शादी से पहले झिंझिया की एक झलक किसी भी प्रकार से टेसू को मिल जाएं, पर क्या मजाल कि लड़कियां यह सब होने देतीं। प्रेम के प्रतीक इस विवाह में प्रेमी जोड़े के विरह को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया जाता है।
लड़के थाली-चम्मच बजाकर टेसू की बारात निकालते हैं। वहीं लड़कियां भी शरमाती-सकुचाती झिंझिया रानी को भी विवाह मंडप में ले आती हैं। फिर शुरू होता है ढोलक की थाप पर मंगल गीतों के साथ टेसू-झिंझिया का विवाह।
लेकिन सात फेरे पूरे भी नहीं हो पाते और लड़के टेसू का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। वहीं झिंझिया भी अंत में पति वियोग में सती हो जाती है। घटोत्कच के पुत्र टेसू के नाक, कान व मुंह कौड़ी के बनाए जाते हैं। विवाह के बाद टेसू का सिर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते हैं। कहते हैं कि इन सिद्ध कौड़ियों से मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं।