नववर्ष पर एक रोचक मनोवैज्ञानिक कहानी जो सुरभि संदेश के एक पाठक ने उपलब्ध कराई है

कालेज में मनोविज्ञान की कक्षा चल रही थी, प्रोफेसर अपना व्याख्यान चालू रखे थे। बीच-बीच में श्यामपट्ट पर कुछ लिखते भी थे, जैसे ही उन्होंने श्यामपट्ट पर कुछ लिखने के लिए चाक उठाया, पीछे से किसी छात्र ने सीटी बजा दी। 

प्रोफेसर ने पूछा सीटी किसने बजाई। कोई नहीं बोला सब चुप। प्रोफेसर ने कहा चलो आज का पाठ यहीं रोकते हैं, आज मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं।

 सब बच्चे राजी हो गए और कहानी तन्मयता से सुनने लगे। 

तब प्रोफेसर ने कहा- ‘‘कल रात मुझे देर तक नींद नहीं आई। मैंने सोचा क्यों ना इस समय का सदुपयोग किया जाए। मैंने सोचा कार में पेट्रोल नहीं है, पेट्रोल ही भरवा लिया जाए। ताकि सुबह कॉलेज जाने में जल्दबाजी ना करना पड़े।’’ 

बच्चों को ध्यान से सुनते हुए प्रोफेसर ने आगे कहा- ‘‘मैंने कार निकाली और पेट्रोल पंप पर जाकर टंकी फुल करवा ली। वापस लौटते वक्त देखा कि सड़कें खाली थीं। तो मैनें सोचा क्यों ना एक-दो लॉन्ग ड्राइव हो जाए। मन भी फ्रेश हो जाएगा।''

 गाड़ी लेकर अभी कुछ ही दूर ही निकला था कि सामने देखा एक खूबसूरत लड़की एक पेड़ के नीचे अकेली खड़ी थी। मैंने सोचा शायद किसी पार्टी से आ रही होगी। फिर मेरे मन में आया कि हो सकता है किसी का इंतजार कर रही हो और उसे लेने वाला ना आ सका हो, इसकी मदद करनी चाहिए।

 छात्र कहानी सुनने में तल्लीन थे और कहानी का भरपूर मजा ले रहे थे। सारी कक्षा शांत होकर आगे की कहानी सुनने को बेचैन थी। तब प्रोफेसर ने कहा- ‘‘मैं लड़की के पास गया और पूछा मैं उसकी क्या मदद कर सकता हूं।’’ लड़की ने सकुचाते हुए कहा- ‘‘मैं एक पार्टी से आ रही हूं और घर जाने के लिए छोटे भाई का इंतजार कर रही हूं।’’ 

मैंने उसकी समस्या को समझते हुए कहा- ‘‘मैं उसको घर छोड़ सकता हूं।’’ यह सुनकर वह कार का दरवाजा खोलते हुए आगे की सीट पर सलीके से बैठ गई। जब कार चलने लगी तो वह कनखियों से मुझे देख रही थी। मुझे इसका भान था, वह देखने में वह बहुत ही सुंदर और आकर्षक थी। मैं कार चला रहा था और हम दोनों में से बोल कोई नहीं रहा था। लेकिन मन ही मन एक दूसरे के बारे में सोच रहे थे। उसने मुझे अपने घर का पता बताया और मुझे वहां तक जाने में आधा घंटा का समय लगा।

रास्ते भर मैं उसके ही बारे में सोच रहा था और वह भी मेरे ख्यालों में डूबी हुई थी। तब प्रोफेसर ने बच्चों की तंद्रा को भंग करते हुए कहा- ‘‘एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर मेरा यह मानना था कि उसके घर के पास आने पर उसने गाड़ी रोकने का इशारा किया गाड़ी रुक गई। 

पर उसने उतरने की कोई जल्दी नहीं थी। उसने अपना परिचय देते हुए अपना नाम पल्लवी बताया और बताया कि वह डाक विभाग के किसी ऑफिस में काम करती है। बिना झिझक के उसने कहा- ‘‘मैं आपकी भलमनसाहत की कायल हूं। आपकी भलमनसाहत को देखकर मैं आपको चाहने लगी हूं।’’ 

उसकी बातों को सुनकर मैंने भी उसे स्वीकार कर लिया और कहा- ‘‘वह मुझे अच्छी लगती है और मैं उसके लिए उचित वर हूं।’’ मैंने उसको बताया- ‘‘मैं राजकीय कालेज में मनोविज्ञान का प्रोफेसर हूं। मेरी इस बात को सुनकर वह बड़ी प्रभावित हुई। 

 पल्लवी ने कहा- ‘‘उसका छोटा भाई उसी राजकीय कॉलेज में मेरा छात्र है।’’ उसने यह भी कहा- ‘‘मैं उसका विशेष ख्याल रखूं।’’ मैंने कहा उसका नाम क्या है, तो उसने बताया उसकी एक पहचान है ‘‘वह सीटी बहुत अच्छी मारता है।’’ 

बच्चों का यह सुनना था कि पूरी कक्षा के सभी छात्रों की नजरें सीटी मारने वाले लड़के पर जाकर टिक गईं। 

बात ये नहीं थी कि पल्लवी उसकी बहन का नाम था। बात तो यह थी कि बिल्ली थैले से अपने आप बाहर आ गई थी। प्रोफेसर ने अपने मनोविज्ञान के ज्ञान से कैसे चालाकी से पता लगा लिया कि सीटी मारने वाला कौन था। सभी छात्रों ने स्वतः ही बता दिया था कि सीटी किसने बजाई थी।

तब प्रोफेसर ने हैरान छात्रों को देखकर कहा ‘‘मैंने अपनी पीएचडी की डिग्री पढ़के कमाई है, खरीदी नहीं है। सारे बच्चे हक्के बक्के होकर प्रोफेसर को देख रहे थे और प्रोफेसर के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान थी।

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