जालौन। खबर का शीर्षक पढ़कर शायद आप भी चैंके होंगे! श्मसान यानी जिंदगी की आखिरी मंजिल और चिता यानी जिंदगी का आखिरी सच। मगर सोचिए, यदि श्मसान में चिता के करीब ही कोई महफिल सजा बैठे। दहकती चिताओं और मातम के बीच ही लड़कियां थिरकनें लगें। जब मौत की खामोशी को तेज संगीत की धुनों पर मस्ती में बदल दिया जाए। खामोश, गमगीन, उदास और बीचबीच में चिताओं की लकड़ियों के चटखने की आवाज के बीच अचानक अगर घुंघरु बजने लग जाए और ढोलक की थाप पर ठमुरी का नाच होने लगे तो... तो चैंकना तो लाजिमी है। इन सब बातों पर यकीन करना मुश्किल जरूर होगा, लेकिन यह सौ फीसदी सच है।
काशी (बनारस) का वह श्मसान घाट जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां चिता पर लेटने वाले को सीधे मोक्ष मिलता है। काशी के 84 घाटों में सबसे चर्चित इस घाट का नाम है मणिकर्णिका घाट। मणिकर्णिका घाट दुनियां का इकलौता श्मसान है, जहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती है। क्योंकि यहां हर वक्त कोई न कोई चिता जल रही होती है। माना जाता है कि जिस दिन मर्णिकर्णिका घाट पर एक भी चिता नहीं जलेगी वह प्रलय का दिन होगा। अब सवाल उठता है कि चिता के बीच ये नाच-गाना किसलिए? क्यों इंसान को मरने के बाद भी चिता पर सुकून मयस्सर नहीं होने दिया जा रहा है? क्यों कुछ लड़कियां श्मसान में चिताओं के करीब नाच रही हैं? आखिर कौन हैं यह लड़कियां? जी हां यह सब उसी मणिकर्णिका घाट पर होता है जो सदियों से मौत और मोक्ष का साक्षी रहा है। इसी घाट पर सजती है मस्ती में मदहोश और चैंका देने वाली महफिल। एक ऐसी महफिल जो जितना डराती है, उससे कहीं ज्यादा हैरान करती है।
कहा जाता है जब पिता से आक्रोशित होकर आदि शक्ति सती हुईं तब उनके कान की बाली इस स्थान पर गिर गई थी। जिसके बाद इस श्मशान का नाम मणिकर्णिका घाट पड़ा। एक दूसरी मान्यता के अनुसार माना जाता है कि भगवान विष्णु ने हजारों वर्ष तक इसी घाअ पर भगवान शिव की आराधना की थी। भगवान शिव और माता पार्वती विष्णुजी की प्रार्थना से प्रसन्न होकर यहां आए थे। जिसके बाद विष्णुजी ने शिवजी से वरदान मांगा था कि सृष्टि के विनाश के समय भी काशी को नष्ट न किया जाए। तभी से मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर जिसकी चिता जलेगी उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।
आमतौर पर श्मसान का माहौल खामोश, गमगीन और उदासी भरा होता है। लेकिन बहुत ही अजीब सी बात है कि काशी के मणिकर्णिका श्मसान घाट के लिए एक रात बेहद खास होती है। यह रात आती है चैत्र नवरात्र की अष्टमी को, इस रात मणिकर्णिका घाट के श्मसान में रौनक छाई रहती है। क्योंकि यह रात पूरे साल में सिर्फ एक बार ही आती है। इसीलिए यह एक रात पूरे साल की 364 रातों में बिल्कुल अनोखी बन जाती है। यह रात श्मसान के लिए जश्न की रात होती है। इस रात में जहां एक ओर श्मसान पर एक साथ चिताएं जलती रहती हैं तो दूसरी ओर घुघरूओं की तेज आवाज में गानों के बीच कदम थिरकते नजर आते हैं।
दरअसल मणिकर्णिका घाट पर चैत्र नवरात्र की अष्टमी को महोत्सव होता है जिसमें नटराज की मूर्ति के सामने रात भर नगर वधुएं (वैश्याएं) नाचती रहती हैं। यह अनूठी साधना नाथ मोहत्सव का हिस्सा है। मान्यता है कि यह परंपरा सैंकड़ों सालों से चली आ रही है। ये वैश्याएं शहर की बदनाम गलियों से आती हैं। मान्यता है कि यह नगर वधुएं इस दुआ के साथ नाचती गाती हैं ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके।
गुजरते वक्त के साथ जब नगरवधुओं ने अपना चोला बदला तो एक बार फिर से इस परंपरा के रास्ते में रोड़े आ गए। आज की तारीख में इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए अब बाहर से भी नर्तकियों को बुलाया जाता है। यही नहीं परंपरा किसाी भी कीमत पर छूटने न पाए, इसका भी खास ख्याल रखा जाता है। यह बेहद चैंकाने वाली परंपरा जितनी सच है उतना ही सच है इन नगर वधुओं का वजूद, जो सैंकड़ों सालों से हर जमाने में मोक्ष की तलाश में यहां आता रहा है।