हाय बैरी ! ये जमाना जुल्म, उस पर ढहा रहा था । बन गई थी अब वो विधवा, फिर भी उसे सजा रहा था ।। -कृष्णा शिवहरे

कलुषित ह्रदय, स्तब्ध मन से लिखती हूं एक कहानी ।
विचलित मन, स्वर में कंपन्न है, नैनों से बहता पानी ।।

हमसफर कहते थे जिसको वो सफर ही न रहा ।
तोड़कर वादे हजारों, इस जहां में ना रहा ।।

सब कुछ समर्पित कर दिया था, मानकर ईश्वर उसे ।
उनके बिना भी जी सकेगी, आशा ना ऐसी थी उसे ।।

हाय बैरी ! ये जमाना जुल्म, उस पर ढहा रहा था ।
बन गई थी अब वो विधवा, फिर भी उसे सजा रहा था ।

फिर निभाई जाने लगीं कुछ अनोखी रीतियां ।
क्यों ? कैसे ? कब बनाई ह्रदय विदारक नीतियां ।।

फिर घाट पर तोड़ी गई थीं, चूड़ियां ये कांच की ।
जल रही, सुलग रही, मेरे भी मन आंच थी ।।

बस यहीं रुक सा गया, थम सा गया संसार था ।
सज रहा था मांग में सिंदूर, नही अंगार था ।।

धार एक पड़ते ही जल की, सिंदूर सारा बह गया ।
छिन गए पैरों से बिछिये, कुछ निशां न रह गया ।।

इस समाज ने एक व्यवस्था अपनी की जारी है ।
ये विवाहित, वो अविवाहित, विधवा और कवारी है ।

इस समाज  में कैसी दुर्गति होती विधवा नारी की ।
भिन्न भिन्न भेद दिए हैं, गलत व्यवस्था सारी की ।

कृष्णा शिवहरे सुरभि संदेश की की जागरूक पाठक होने के साथ ही साहित्य के क्षेत्र में भी विशेष हस्तक्षेप रखती हैं। सुरभि संदेश पूर्व में भी सुरभि साहित्य कालम में इनकी कविताओं को प्रकाशित करता रहा है। आशा है आपको इनकी कविताएं पसंद आती होंगी। अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत कराते रहें। धन्यवाद!


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